सतीप्रथा पर प्रतिबन्ध

सतीप्रथा पर प्रतिबंध*
*सन 1823 ईस्वी की घटना है। एक कोंकण ब्राह्मणी राधाबाई को सती के नाम पर जलाने का प्रबंध किया गया। ओंकारेश्वर के पास उसे चिता पर बैठाया गया। चिता में जब आग लगाई गई। जब राधाबाई चिता की आग को बर्दाश्त नहीं कर पाई। तब वह चिता से बाहर कूद पड़ी। जान बचाने के लिए नदी की तरफ भागी। उसका पूरा शरीर झुलस गया था। फिर भी कोंकणी ब्राह्मणों नें उसे पकड़कर दोबारा चिता में डाल दिया। पुनः भागने पर कोंकणी ब्राह्मणों नें उसे बांसों से ठेल ठेल कर पुनः जलाने का प्रयास किया। चिता के चारों ओर कोंकणी ब्राह्मण बड़े जोर जोर से ढोल पीटकर भजन और मंत्र उच्चारित कर रहे थे। ताकि उसकी चीखें बाहर नहीं जा सकें।घटना के वक़्त वहां से गुजर रहे एक अंग्रेज ने उसे बचाया। शहर में ले जाकर उसका इलाज कराया पर अत्यधिक जलनें के कारण आखिर उसकी तीन दिन बाद मृत्यु हो गयी। इस प्रकार के अमानवीय क्रूर और घृणित कारनामों में हस्तक्षेप करके अंग्रेज अधिकारियों ने उस पर कठोर पाबंदी लगाने का प्रयास किया। कैप्टन राबर्टसन ने ऐलान करवा दिया कि आज के बाद यदि ऐसी घटनाएं दोबारा हुईं तो हत्या समझकर कठोर कार्यवाई की जाएगी। अंग्रेजी सरकार के आदेश को हिन्दू धर्म पर आक्रमण मानकर नासिक, पैठण आदि शहरों के ब्राह्मणों की बैठक हुई और कानून की ओर आंख बन्दकर सती प्रथा को यथावत चालू रखने की नई योजना बनाई गई। सती प्रथा तोड़नें वाला कानून नहीं बनें। इसके लिए कोंकणी ब्राह्मणों नें अपना एक वकील प्रतिनिधि इंग्लैंड भेजा। लेकिन इंग्लैंड की महारानी और वहां की संसद नें सती प्रथा के नाम पर किसी स्त्री को जबरन जिंदा जलाने की अनुमति नहीं दियी। चारों ओर से निराश ब्राह्मणों नें कानून को धता बताते हुए सती प्रथा के नाम पर विधवा स्त्री को जबरन जिंदा जलाने की निम्न नई नीति तैयार कियी:-*
*जिसके अनुसार सती होने वाली स्त्री को जिंदा जलाने के लिए किसी खास सुनसान जगह पर घास का मंडप बनाकर उस पर गोबर के उपले तथा चंदन की लकड़ियां रखीं जाएं। फिर उसपर सती होने वाली स्त्री को बैठाकर आग लगाई जाए। आग लगने पर यदि वह स्त्री फिर भी किसी तरह चिता से बाहर आ भी जाय और अपनी जान बचा ले तो उसे किसी भी तरह से दोबारा बिरादरी में शामिल नहीं किया जाय। उसे हमेशा के लिए समाज से बहिष्कृत कर दिया जाय। साथ ही साथ उस स्त्री के माँ बाप को भी बिरादरी से बहिष्कृत किया जाय। यही है तथाकथित हिन्दू धर्म के काले कलंक का एक काला सच।*

*जिसको 26 नवम्बर सन 1949 को डा.बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर नें संविधान बनाकर सती प्रथा को ध्वस्त किया। धर्म की क्रूरता से अबला कहलाने वाली स्त्री को सबला बनाकर मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के साथ वैज्ञानिक बनाकर अंतरिक्ष तक पहुंचाया। लेकिन दुःखद विषय है कि धार्मिक गुलामी की मजबूत जंजीरों में जकड़ी पढ़ी लिखी महिला आज भी अपनी ताकत को नजरअंदाज कर चांद और अंतरिक्ष की सैर कर आने के बाद भी चांद को पति परमेश्वर के रूप में मानकर पूजनें से नहीं चूकती है। बहुत कुछ सुधरा है परन्तु जितना सुधरा उससे ज्यादा सुधरना अभी और बाकी है। जरा सी ढील हुई कि धार्मिक दरिंदे अब भी इस अत्याधुनिक वैज्ञानिक इक्कीसवीं सदी में भी घात लगाकर बैठे हैं। जब भी मौका मिला पुनः उसी धार्मिक क्रूर काली गहरी खाई में ढकेलने से नहीं चूकेंगे। जहां से बड़ी मेहनत से बुद्ध, फुले, साहू, पेरियार और अम्बेडकर जैसे क्रांतिवीर महामानव बड़ी मेहनत से स्त्री की समानता स्वतंत्रता स्वाभिमान न्याय मानवाधिकार और मौलिक अधिकार की रक्षा करके महिलाओं को ब्राहमण धर्म के ढोंग पाखंड कर्मकाण्ड आडम्बर अंधविश्वास अंधभक्ति के सती प्रथा के अधर्म से निकालकर लाये हैं।*

*संदर्भ:- दलित दस्तावेज ‘पृष्ठ-95-96’*

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