अब मुंबई में ईवीएम में हुए कथित धांधली के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत

30 मई को ईवीएम के खिलाफ राष्ट्रीय विरोध दिवस घोषित किया गया है. और उसमें उन्होंने सभी नागरिकों, सामाजिक आंदोलनों के कार्यकर्ताओं और उनके नेताओं के साथ-साथ राजनैतिक दलों को भी आमंत्रित किया है.

ईवीएम के खिलाफ मुंबई में आंदोलन की तैयारी

ईवीएम के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू हो गया है. अब बनारस के बाद मुंबई में आंदोलन की तैयारी चल रही है. कल यानी 30 मई को जब नरेंद्र मोदी दिल्ली में दोबारा पीएम पद की शपथ ले रहे होंगे उसी समय मुंबई में आजाद मैदान के पास इसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहा होगा. “ईवीएम हटाओ, लोकतंत्र बचाओ” नारे के साथ होने वाले इस प्रदर्शन की अगुआई रिटायर्ड जस्टिस कोलसे पाटिल करेंगे. इसके अलावा तमाम सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और पत्रकार इसमें हिस्सा लेंगे.

बैलट पेपर की मांग

ईवीएम विरोधी राष्ट्रीय जन आंदोलन के बैनर तले शुरू हुए इस अभियान के लोगों का कहना है कि वो देश में कोई भी चुनाव बैलट पेपर से चाहते हैं. इस सिलसिले में इन लोगों ने एक पर्चा भी जारी किया है.

ईवीएम का मैनीपुलेशन हुआ है

बांटे गए पर्चे में ईवीएम के विश्वसनीयता पे गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है. हाल के लोकसभा के चुनाव नतीजों ने पूरे राष्ट्र को सकते में डाल दिया है. इनका कहना है कि उन्हें पहले ही इस बात का विश्वास था कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है. अब मौजूदा नतीजों और उसमें आयी संभावना से ज्यादा सीटों ने इस बात को पुख्ता कर दिया है. पर्चे में कहा गया है कि महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों के संबंध में चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों पर अगर गौर फरमाएं तो उसमें डाले गए मतों और बाद में उनकी गिनती में भारी अंतर है. मध्य प्रदेश की 203 विधानसभा सीटों पर भी यही हाल है. उनका कहना है कि यही बात इसको साबित करने के लिए काफी है कि ईवीएम का मैनीपुलेशन हुआ है. और मौजूदा चुनाव नतीजों पर किसी भी रूप में विश्वास नहीं किया जा सकता है.

पर्चे में आगे कहा गया है कि सोशल मीडिया पर भी पूरे देश से इस तरह की रिपोर्ट आयी हैं. मतगणना से ठीक पहले ईवीएम मशीनों का जिस तरह से इधर से उधर आना जाना शुरू हुआ था उसने भी चुनाव नतीजों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है. पहले चरण से ही पूरा मीडिया यह कह रहा था कि एनडीए को कम से कम 140 सीटों का नुकसान होने जा रहा है. आबादी का 50 फीसदी हिस्सा जो कृषि पर निर्भर है वह पूरी तरह से हताश था और माना जा रहा था कि उसका गुस्सा चुनावों में सरकार के खिलाफ मतदान के जरिये निकलेगा. इसके अलावा जीएसटी से लेकर राफेल और नोटबंदी से लेकर तमाम ऐसे मुद्दे थे जिन पर सरकार घिरी हुई थी.

ईवीएम सरकार

पर्चे में कहा गया है कि चुनाव नतीजों के बाद पूरे देश में सन्नाटा पसरा हुआ था. कहीं से कोई जश्न का माहौल नहीं था. यह बताता है कि लोग बिल्कुल सदमे में थे और उन्हें नतीजों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था. आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्हें बीजेपी की जीत की कोई संभावना नहीं दिख रही थी. इसीलिए उन लोगों ने इसे ईवीएम सरकार की संज्ञा दी है.

उनका कहना है कि पूरे चुनाव के दौरान चुनाव आयोग का रवैया बेहद गैरजिम्मेदाराना और संदेहास्पद रहा. और वह हर जगह सरकार के साथ खड़ा रहा. उनका कहना है कि सभी संस्थाओं की तरह मोदी ने चुनाव आयोग को भी चौपट कर दिया.
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लिहाजा उन सभी लोगों ने जनता की अदालत में जाने का फैसला लिया है. और उन्हें पूरी उम्मीद है कि जनता का उसे भरपूर समर्थन मिलेगा. उनका कहना है कि यहां ये बताना बेहद महत्वपूर्ण है कि ज्यादा से ज्यादा लोकतांत्रिक देशों ने ईवीएम मशीनों को खारिज कर दिया है वो अपने यहां मतदान बैलट पेपर पर कराते हैं. ऐसे में अगर कहा जाए कि ईवीएम देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है तो कोई गलत बात नहीं होगी. लिहाजा लोकतंत्र को बचाने के लिए ईवीएम को हटाना हर नागरिक का अब प्राथमिक कर्तव्य हो गया है.
इस सिलसिले में जब जस्टिस कोलसे पाटिल से जनचौक की बात हुई तो उनका कहना था कि उन्होंने ईवीएम के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कर दी है. अब बारी जनता की है. हालांकि उनका कहना था कि लोगों की प्रतिक्रिया बहुत सकारात्मक है. उन्होंने कहा कि लोगों को अब बाहर आकर इसके खिलाफ अपने गुस्से को जाहिर करना चाहिए.

लिहाजा 30 मई को ईवीएम के खिलाफ राष्ट्रीय विरोध दिवस घोषित किया गया है. और उसमें उन्होंने सभी नागरिकों, सामाजिक आंदोलनों के कार्यकर्ताओं और उनके नेताओं के साथ-साथ राजनैतिक दलों को भी आमंत्रित किया है.

आंदोलन में जस्टिस पाटिल के अलावा, डॉ. सुरेश खैरनार, पत्रकार निरंजन टाकले, सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी,रवि भिलाने, फिरोज मिथिबोरवाला,ज्योति बाडेकर,सलीम अलवारे, धनंजय शिंदे आदि शामिल हैं.

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