लोकतंत्र का चौथा खम्भा गिर चुका है !

राम मंदिर, लव ज़िहाद, घर वापसी, गौ मांस, गौ रक्षा, सहिष्णुता, असहिष्णुता, शाहरुख़ खान, आमिर खान, कन्हैया कुमार, जे ऍन यू, भारत माता की जय, बन्दे मातरम, कश्मीर, सर्जिकल स्ट्राइक, तीन तलाक़, नोट बंदी, अज़ान की शोर (सोनू निगम).

पिछले पांच सालों में मीडिया बड़ी चतुराई से व्यर्थ के मुद्दों पे देश को भ्रमाये और भटकाए रखने में व्यस्त रही है. और इसी बीच बहुत बड़े बड़े कारनामे हो गए.
पिछले पांच सालों में मीडिया बड़ी चतुराई से व्यर्थ के मुद्दों पे देश को भ्रमाये और भटकाए रखने में व्यस्त रही है. और इसी बीच बहुत बड़े बड़े कारनामे हो गए.

आम आदमी की बुनियादी सवालों को ताक पे रखकर इन बेकार की मुद्दों में पुरे पांच साल मीडिया व्यस्त रही है. अब थोड़ा गौर कीजिये:-

  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने टीवी पर सरकारी शिक्षा की गिरते स्तर पे बहस देखा है?
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने ग्रामीण भारत में हो रहे बाल विवाह की गंभीर समस्या पर एक्सपर्ट की कोई टीम को टीवी पे देखा है.
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने सड़कों पे भीख मांगते या भूख से बिलखते बच्चों के पीछे कोई मीडिया कैमरा को देखा है?
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने नाले किनारे, फुटपाथों पे ज़िन्दगी को कूड़े के ढेर की तरह ढोते हुए लोगों के लिए किसी रिपोर्टर को टीवी पे चिल्लाते हुए देखा है?
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने आत्महत्या करते किसानो के बारे में किसी को सहानुभूति जताते हुए देखा है?
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने कुपोषण से शिकार महिलाओं एवं बच्चों के हक़ में किसी रिपोर्टर को घड़ियाली आंसू बहाते देखा है?
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने बेरोज़गारी को मार झेल रहे नौ जवानो के हक में किसी रिपोर्टर को बात करते सुना है?
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने हायर एजुकेशन के गायब होते स्कालरशिप पर किसी टीवी बहस को सुना है?
  • क्या इन पांच सालों में कभी आपने ग्रामीण क्षेत्रों की नौजवानों की बेतहाशा पलायन पर किसी रिपोर्टर की चिल्लाते देखा है?
नशाख़ोरी मे लिप्त बचप्पन, वेश्या वृत्ति में बच्चियां और बदहाली में मुल्क़, ये सब टीआरपी नहीं देते हैं.
नशाख़ोरी मे लिप्त बचप्पन, वेश्या वृत्ति में बच्चियां और बदहाली में मुल्क़, ये सब टीआरपी नहीं देते हैं.

पिछले पांच सालों में मीडिया बड़ी चतुराई से व्यर्थ के मुद्दों पे देश को भ्रमाये और भटकाए रखने में व्यस्त रही है. और इसी बीच बहुत बड़े बड़े कारनामे हो गए. चाटुकारिता के इस दौड़ में सबसे तेज़, सबसे आगे निकलने के होड़ में शामिल आज की पत्रकारिता कितनी बदल गयी है. एजेंडा से जनता गायब है क्योंकि जनता खुद ही एजेंडा हो गए है. सत्ता के द्वारा फेंकी हड्डी को चाटने के होड़ में शामिल पत्रकारों ने भी गिरगीट के तरह रंग बदल लिया है. अब कैमरे के फोकस में भूखे मरता किसान नहीं है, रोटी कपडा मकान नहीं है, सिर्फ हंगामें हैं. पत्रकारों के आँखों में अब विज़न नहीं क्योंकि उनकी आँखे पाखंडो की मोतियाबिन्द से धुंधली हो चुकी है. नशाख़ोरी मे लिप्त बचप्पन, वेश्या वृत्ति में बच्चियां और बदहाली में मुल्क़, ये सब टीआरपी नहीं देते हैं.

चाटुकार मीडिया ने ख़बरों के मायने ही बदल कर रख दिए हैं. खबरे ज़िन्दगी को खतरों से खबरदार करती हैं. खबरे इंसान को बुराइयों से लड़ने को तैयार करती हैं. लेकिन ख़बरें जब बाज़ारू हो जाये तब मीडिया सत्ता की रखैल बन जाती हैं. तब समाचारों से शिष्टाचार गायब हो जाता है. खबर तब खबर नहीं रह जाता है. वह कठपुतली बन जाता है जिसका डोर पूँजीपत्तियों के हाथों में बेच दिया जाता है, तब मीडिया के नाम पर पाखंडों का नंगा नाच चलता है. ब्रेकिंग न्यूज़ बहुत कुछ तोड़ देता है. प्राइम टाइम में कुछ भी प्राइम नहीं रहता है. एंकर ख़बरों के नाम पर सत्ता के तारीफ़ में क़सीदे पढ़ने लगता हैं. एंकर दरिंदो का सपोर्टर हो जाता हैं. टीवी समाज में कैंसर रूपी विद्वेष फ़ैलाने लगता है. भूख की बात अब सीधी बात से हल होतें हैं. ग़रीबी को ज्योतिष शास्त्र से दूर किया जाता है. क़लम और ज़ुबान का सौदा होता है. दर्द की बोली लगती है. राष्ट्रवाद बिकने लगता है. ज़मीर को ज़मीन पे रौंद दिया जाता है. टीआरपी के हिसाब से नफ़रतें तय की  जाती है. दाढ़ी में आतंक, मूछों में जाति, कपड़ों में धर्म और खाने में अधर्म की खोज होती है.

पाखंडियों और धूर्तों की कपटपूर्ण बकवासों में पुरे दिन की असली खबरें कहीं गुम हो जाती हैं. मंदिरों के घंटों में झोपडी की चीखें दबा दी जाती है. अज़ान के शोर में ग़ुरबत की चीखें दबा दी जाती है. शनि के महात्मय में गरीबी की कोई जगह नहीं होती है. न्याय के नाम पे अन्याय के मार्केटिंग का यह धंधा तब तक चलता रहेगा जब तक मीडिया उद्योगपत्तियों के पैसों पे चलता रहेगा.

  • पत्रकारिता का यह समूह अब लूटेरों का गिरोह बन चुका है.
  • यह मिटटी को छोड़कर हवा में उड़ चुका है.
  • अपने कर्तव्यों से यह कब का फ़िर चुका है..
  •  कि लोकतंत्र का चौथा खम्भा अब औंधे मुंह गिर चुका है.

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