छोड़ी गई औरतों के लिए भी बोलें प्रधान सेवक

पतियों द्वारा छोड़ी गई और/या घर से निकली गई महिलाओं की ज़िंदगी बहुत ही दयनीय है. 2011 जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 24 लाख छोड़ी गई औरतें हैं, जो तलाक़शुदा औरतों की संख्या के दोगुने से भी ज़्यादा है.

तीन तलाक़ को मुस्लिम महिला के सशक्तिकरण के लिए बड़ा मुद्दा बनाने की आरएसएस, भाजपा और यहां तक कि प्रधान सेवक मोदी की जल्दीबाज़ी कई सवालों को जन्म देती है.

वृद्धा आश्रमों में दयनीय हालत में औरतें
वृद्धा आश्रमों में दयनीय हालत में औरतें

इसकी जगह तो उन्हें समाज के हर समुदाय को प्रभावित करने वाले लगभग 4 करोड़ विधवा महिलाओं की चिंता करनी चाहिए. उन्हें पुनर्विवाह करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए और/या उन्हें अपना जीवन चलाने के लिए कार्यक्रमबद्ध वित्तीय सहायता मुहैया कराने की ओर ध्यान देना चाहिए.

भारत में तलाक़शुदा औरतों की संख्या भी दस लाख के करीब है, जिन्हें सामाजिक और सरकारी मदद की जरूरत है. इतना ही नहीं, अलग की गई और छोड़ी गई महिलाओं का मुद्दा भी तीन तलाक़ के मुद्दे से कहीं ज़्यादा गंभीर है.

2011 के जनगणना के मुताबिक भारत में लगभग 24 लाख छोड़ी गई औरतें हैं, जो कि तलाक़शुदा औरतों की संख्या के दोगुने से भी ज़्यादा है.

20 लाख ऐसी हिंदू महिलाएं हैं, जिन्हें अलग कर दिया गया है या छोड़ दिया गया है. मुस्लिमों के लिए यही लगभग 3 लाख, ईसाइयों के लिए 90 हजार, और अन्य धर्मों के लिए करीब 80 हजार है.

एक़तरफा छोड़ दी गई हर औरत का जीवन दयनीय है. उन्हें अपने ससुराल और मायके दोनों जगहों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

ससुराल वाले उनके साथ इसलिए नहीं आते, क्योंकि उनके बेटे ने उसे छोड़ दिया है और मायके में उनकी अनदेखी इसलिए होती है क्योंकि शादी के बाद औरत का घर पति का घर ही बन जाता है, जिसकी ज़िम्मेदारी पति या ससुराल में ही किसी और की है.

वे फिर से शादी नहीं कर सकतीं क्योंकि उन्हें कानूनी तरीके से तलाक़ नहीं दिया गया है. इनमें से ज़्यादातर सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद गंभीर हालात में अपना जीवन गुज़ार रही हैं.

साथ ही उनका दूसरों द्वारा उनके शोषण का ख़तरा भी बना रहता है. वे अपने पति के साथ रहना चाहती हैं, बस उनके बुलाने भर का इंतज़ार कर रही हैं.

अगर वे एक बार भी मुझे बुलाएं तो मैं उनके साथ चली जाऊंगी
अगर वे एक बार भी मुझे बुलाएं तो मैं उनके साथ चली जाऊंगी

43 वर्षों से अपने पति के साथ नहीं रह रहीं जशोदा बेन मोदी ने 24 नवंबर, 2014 को कहा था कि ‘अगर वे एक बार भी मुझे बुलाएं तो मैं उनके साथ चली जाऊंगी’. लेकिन उनके पति ने कभी जवाब नहीं दिया.

छोड़ी गई महिलाओं को भारत में पासपोर्ट बनवाने में भी दिक्कतें पेश आती हैं. उदाहरण के तौर पर 2015 में जशोदाबेन ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनका आवेदन इस आधार पर ख़ारिज कर दिया गया था कि ‘उनके पास न तो शादी का कोई प्रमाण-पत्र था न ही पति के साथ कोई साझा हलफनामा ही था.’

उन्होंने इसके लिए काफी संघर्ष किया. आखिरकार उन्हें अपने पति के पासपोर्ट के ब्यौरे के लिए एक आरटीआई लगानी पड़ी.

जो भी तीन तलाक़ का भुलावा देकर मुस्लिम महिलाओं की हालत सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें देश की 24 लाख छोड़ दी गई औरतों की तकलीफों की भी जानकारी होनी चाहिए. मोदी जी का भी कहना कि ‘धर्म और समुदाय के नाम पर हमारी मांओं और बहनों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होना चाहिए’.

सीधा सवाल

क्या मोदी इन छोड़ी गई औरतों को इन्साफ दिलवाएंगे, इस तथ्य के बावजूद कि इनमें ज़्यादातर, करीब 19 लाख, हिंदू महिलाओं की है और उनकी तकलीफों की बात करने से कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने वाला?

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